Imran Pratapgarhi Shayari
Imran Pratapgarhi Shayari: इमरान प्रतापगढ़ी एक ऐसा नाम है, जिसे आज हर शायरी प्रेमी जानता है। उनकी शायरी में दर्द भी है, मोहब्बत भी है, और समाज की सच्चाई भी। इमरान जी की हर शायरी दिल को छू जाती है, क्योंकि उनके शब्द सीधे दिल से निकलते हैं और दिल में ही उतर जाते हैं।
उनकी शायरी सिर्फ़ मोहब्बत की बात नहीं करती, बल्कि समाज की तकलीफ़ें, लोगों की उम्मीदें और सच्चाई को भी बयां करती है। वो अपनी कलम से दिलों को जोड़ने का काम करते हैं।
Imran Pratapgarhi Shayari

ख्वाब की तरह पल के आये हैं।
कितने सांची में ढल के आये हैं।
तुम सिफारिश से हो जहाँ पहुँचे
हम वहां खुद ही चल के आये हैं.!
हाथों की लकीरें पढ कर रो देता है दिल
सब कुछ तो है मगर एक तेरा नाम क्यूँ नहीं है….
ज़माने पर भरोसा करने वालों.
भरोसे का ज़माना जा रहा है !
एक बुरा दौर आया है टल जाएगा,
वक़्त का क्या है एक दिन बदल जाएमा.!
अपनी सांसो में आबाद रखना मुझे.
में रहू ना रहू याद रखना मुझे…..!!
तेरे चेहरे में ऐसा क्या है आख़िर,
जिसे बरसों से देखा जा रहा है !!!
एक बुरा दौर आया है टल जाएगा,
वक़्त का क्या है एक दिन बदल जाएमा.!
अपनी मोहब्बत का यो बस एक ही उसूल है,
तू कुबूल है और तेरा सबकुछ कुबूल है।
ये तो इक रस्मे जहाँ है जो अदा होती है,
वरना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है।
इमरान प्रतापगढ़ी शायरी हिंदी में
हिम्मत है तो बुलंद कर आवाज़ का अलम,
चुप बैठने से हल नहीं होने का मसअला.!
दिल के हर खाली गिलास में प्यार का अमृत ढाला जाए,
मंदिर में एक दीप जले तो मस्जिद तलक उजाला जाए.!
हर तरफ़ ज़ुल्म की साज़िशें हैं,
इनसे बचने की गर ख़्वाहिशें है.!
रिश्तों की ये नाजुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं,
अपनी आंखें दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं.!
इस तरह हौसले आज़माया करो,
मुश्किलें देखकर मुस्कुराया करो !
दो निवाले भले कम ही खाया करो,
अपने बच्चों को लेकिन पढ़ाया करो !!
मुझको ज़ालिम का तरफ़दार नहीं लिख सकते,
कम से कम वो मुझे लाचार नहीं लिख सकते।
जाँ हथेली पे लिये बोल रहा हूँ जो सच
उसको इस देश के अखबार नहीं लिख सकते।
चाक दामन रफ़ करके लिखता हूँ मैं,
ज़ख़्म से गुफ़्तगू करके लिखता हूँ मैं,
दर्द गाने को भी हौसला चाहिए,
आँसुओं से वजू करके लिखता हूँ मैं.!
उनकी कोशिश है दंगा सलामत रहे,
काश ज़म-ज़म और गंगा सलामत रहे,
उनके सपनों में बस एक ही रंग है,
मेरी ख़्वाहिश तिरंगा सलामत रहे.!
हमने सीखा है ये रसूलो से,
जंग लडना सदा उसूलों से !
नफरतों वाली गालियाँ तुम दो,
हम तो देंगे जवाब फूलों से !!
वो जो बात करते थे दुनिया हिला देंगे!
अपनी ताकतों से उसको मिटा देंगे !!
वो गुरूर घमंड वाले सब औंधे मुँह पड़े है!
वक़्त के हिटलर सब सहमे सहमे से खड़े है !!
Imran Pratapgarhi Shayari Love
अब ना मैं हूँ ना बाकी हैं ज़माने मेरे,
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे,
जिन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे,
अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे।
चक दमन रफू करके लिखता हूँ मैं,
ज़ख्मा से गुफ्तगू करके लिखता हूँ,
दर्द गाने को भी हौसला चाहिए,
आंसुओं से वजू करके लिखता हूँ मैं..
मेरे खुलूस की गहराई से नहीं मिलते,
ये झूठे लोग हैं सच्चाई से नहीं मिलते,
मोहब्बतों का सबक दे रहे हैं दुनिया,
को जो ईद अपने सगे भाई से नहीं मिलते।
चाक दामन रफू करके लिखता हूँ,
मैं ज़ख़्म से गुफ़्तगू करके लिखता हूँ,
मैं दर्द गाने को भी हौसला चाहिए,
आँसुओं से वजू करके लिखता हूँ मैं.!
इस तरह हौसले आज़माया करो,
मुश्किलें देखकर मुस्कुराया करो !
दो निवाले भले कम ही खाया करो,
अपने बच्चों को लेकिन पढ़ाया करो !!
हमने सीखा है ये रसूलो से,
जंग लडना सदा उसूलों से !
नफरतों वाली गालियाँ तुम दो,
हम तो देंगे जवाब फूलों से !!
अपने मासूम से अरमान भी दे सकते हैं,
अपने इस गुस्से को पहचान भी दे सकते हैं।
सारी दुनिया के जो गुस्ताख़े नबी हैं,
सुन लें हम मुहम्मद के लिये जान भी दे सकते हैं।
क्या आरजू करूँ मैं तेरी आरजू के बाद,!
कुछ भी नहीं बचेगा मेरी गुफ्तगू के बाद !!
दुनिया का कोई ख़ौफ मुझे क्या डरायेगा,!
माँ ने है मुझको दूध पिलाया वजू के बाद !!
अब जुदाई के सफ़र को मेरे आसान करो,
तुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो!
हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना पुराने हो गए है,
कि उस गली में गए अब ज़माने हो गए है!
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