Allama Iqbal Shayari
Allama Iqbal Shayari: अल्लामा मुहम्मद इक़बाल उर्दू भाषा के महानतम कवियों में से एक हैं। वे सिर्फ़ एक कवि ही नहीं, बल्कि एक विचारक, दार्शनिक और युवाओं के मार्गदर्शक भी थे। उनकी शायरी ज्ञान, प्रेरणा और मानवता के प्रति प्रेम से परिपूर्ण है।
निदा फाजली की कुछ बेहतरीन रचनाएं पढ़ें, जो आपको जीवन के बारे में बहुत कुछ बताती हैं।
Allama Iqbal Shayari

दीप ऐसे बुझे फिर जले ही नहीं,
ज़ख्म इतने मिले फिर सिले भी नहीं,
व्यर्थ किस्मत पे रोने से क्या फायदा
सोच लेना कि हम तुम मिले भी नहीं।
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के “इम्तिहाँ” और भी हैं,
तही “ज़िंदगी” से नहीं ये फ़ज़ाएँ,
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं.!
जो किए ही नहीं कभी मैंने,
वो भी वादे निभा रहा हूँ मैं.
मुझसे फिर बात कर रही है वो,
फिर से बातों मे आ रहा हूँ मैं !
तिरे इश्क़ की “इंतिहा” चाहता हूँ,
मिरी “सादगी” देख क्या चाहता हूँ,
ये जन्नत “मुबारक” रहे ज़ाहिदों को,
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ।
जलाम-ए-बहर में खो कर सँभल जा,
तड़प जा पेच खा खा कर बदल जा,
नहीं साहिल तिरी किस्मत में ऐ मौज,
उभर कर जिस तरफ चाहे निकल जा.. ।
तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ,
मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ,
भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी,
बड़ा बे-अदब हूँ, सज़ा चाहता हूँ..!
ये कफन, ये क़ब्र,
ये जनाज़े रस्म ए शरीयत है,
इकबाल मार तो इंसान तब ही जाता है,
जब याद करने वाला कोई ना हो..!
मुझ सा कोई शख्स नादान भी न हो,
करे जो इश्क़ कहता है नुकसान भी न हो.!
मकानी हूँ कि आज़ाद-ए-मकां हूँ,
जहां में हूँ कि खुद सारा जहां हूँ,
वो अपनी ला-मकानी में रहे मस्त,
मुझे इतना बता दें मैं कहां हूँ.!
Allama Iqbal Shayari in Hindi
कुछ बातें अनकही रहने दो,
कुछ बातें अनसुनी रहने दो…!
माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं,
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख.!
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.!
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा वर पैदा.!
तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा,
तिरे सामने आसमाँ और भी हैं.!
नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर,
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में.!
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं.!
मजनूँ ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे,
नज़्ज़ारे की हवस हो तो लैला भी छोड़ दे.!
ख़िरद-मंदों से क्या पूछें कि मेरी इब्तिदा क्या है,
कि मैं इस फ़िक्र में रहता हूँ मेरी इंतिहा क्या है.!
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ,
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ.!
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं.!
अल्लामा इक़बाल शायरी
ज़िंदगी का असली मजा,
मेहनत में ही है,
कभी हार मत मानो,
तुम खुदा की तरह हो!”
तू किसी से कम नहीं है,
ख़ुद को पहचान,
अपने रास्ते खुद बना,
अपना क़दम पहचान !”
हज़ारों सालों की चुप्प,
एक जुमला तो कह देता है,
जो दिल की सुनता है,
वही सच्चा कह देता है।
वो तुझसे भी बेहतर हैं,
जिनका तेरा दिल चाहता है,
अपनी पहचान को जरा,
कुछ और नजर से देख।
मोहब्बत की राह में,
इक़बाल तुमसे कह रहा हूँ,
जितना चाहोगे उतना ही पास पाओगे,
फिर भी दूर रहोगे।
Allama Iqbal Shayari 2 Line
वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है,
तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में!
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ,
या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो!
ढूँढता फिरता हूँ मैं ‘इक़बाल’ अपने आप को,
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं!
हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा,
हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं!
आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं,
महव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी!
नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त,
ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना!
जीना वो क्या जो हो नफ़स-ए-ग़ैर पर मदार,
शोहरत की ज़िंदगी का भरोसा भी छोड़ दे!
सौ सौ उमीदें बँधती है इक इक निगाह पर
मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई!
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा!
दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है,
फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है!